सूरह अल-जासिया

أَفَرَءَيْتَ مَنِ ٱتَّخَذَ إِلَـٰهَهُۥ هَوَىٰهُ وَأَضَلَّهُ ٱللَّهُ عَلَىٰ عِلْمٍ وَخَتَمَ عَلَىٰ سَمْعِهِۦ وَقَلْبِهِۦ وَجَعَلَ عَلَىٰ بَصَرِهِۦ غِشَـٰوَةً فَمَن يَهْدِيهِ مِنۢ بَعْدِ ٱللَّهِ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ

Afa ra'aita manittakhaża ilāhahū hawāhu wa aḍallahullāhu ‘alā ‘ilmiw wa khatama ‘alā sam‘ihī wa qalbihī wa ja‘ala ‘alā baṣarihī gisyāwah(tan), famay yahdīhi mim ba‘dillāh(i), afalā tażakkarūn(a).

क्या तुमने उस व्यक्ति को नहीं देखा जिसने अपनी इच्छा ही को अपना उपास्य बना लिया? अल्लाह ने (उसकी स्थिति) जानते हुए उसे गुमराही में डाल दिया, और उसके कान और उसके दिल पर ठप्पा लगा दिया और उसकी आँखों पर परदा डाल दिया। फिर अब अल्लाह के पश्चात कौन उसे मार्ग पर ला सकता है? तो क्या तुम शिक्षा नहीं ग्रहण करते?

📝 टिप्पणी
688) अल्लाह उस व्यक्ति को भटकने देता है (गुमराह छोड़ देता है) क्योंकि वह जानता है कि वह उस मार्गदर्शन (हिदायत) को स्वीकार नहीं करेगा जो उसने उसे प्रदान किया है.

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