सूरह अल-अहज़ाब
وَأَنزَلَ ٱلَّذِينَ ظَـٰهَرُوهُم مِّنْ أَهْلِ ٱلْكِتَـٰبِ مِن صَيَاصِيهِمْ وَقَذَفَ فِى قُلُوبِهِمُ ٱلرُّعْبَ فَرِيقًا تَقْتُلُونَ وَتَأْسِرُونَ فَرِيقًا
Wa anzalal-lażīna ẓāharūhum min ahlil-kitābi min ṣayāṣīhim wa qażafa fī qulūbihimur-ru‘ba farīqan taqtulūna wa ta'sirūna farīqā(n).
और किताबवालों में सो जिन लोगों ने उसकी सहायता की थी, उन्हें उनकी गढ़ियों से उतार लाया। और उनके दिलों में धाक बिठा दी कि तुम एक गिरोह को जान से मारने लगे और एक गिरोह को बन्दी बनाने लगे
📝 टिप्पणी
616) जब संधिवार्ता करने वाले (गठबंधन वाले) दल तितर-बितर हो गए, तो अल्लाह सुबहानहु व ताआला ने नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को यहूदी बनी कुरैज़ा को दंड देने और उन्हें उनके किलों से निकालने का आदेश दिया। इसके बाद युद्ध में भाग लेने वाले सभी वयस्क पुरुषों को मृत्युदंड दिया गया, जबकि महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया गया।