सूरह अत-तग़ाबुन
إِن تُقْرِضُوا۟ ٱللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَـٰعِفْهُ لَكُمْ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۚ وَٱللَّهُ شَكُورٌ حَلِيمٌ
In tuqriḍullāha qarḍan ḥasanay yuḍā‘ifhu lakum wa yagfir lakum, wallāhu syakūrun ḥalīm(un).
यदि तुम अल्लाह को अच्छा ऋण दो तो वह उसे तुम्हारे लिए कई गुना बढ़ा देगा और तुम्हें क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा गुणग्राहक और सहनशील है,
📝 टिप्पणी
720) इस आयत में जिस "ऋण" (क़र्ज़) का उल्लेख किया गया है, उससे तात्पर्य सदक़ा (दान), इन्फ़ाक़ (अल्लाह की राह में ख़र्च करना), वक़्फ़, ज़कात और अन्य नेक कार्यों से है।
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