सूरह अन-नूर
وَٱلَّذِينَ كَفَرُوٓا۟ أَعْمَـٰلُهُمْ كَسَرَابٍۭ بِقِيعَةٍ يَحْسَبُهُ ٱلظَّمْـَٔانُ مَآءً حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَهُۥ لَمْ يَجِدْهُ شَيْـًٔا وَوَجَدَ ٱللَّهَ عِندَهُۥ فَوَفَّىٰهُ حِسَابَهُۥ ۗ وَٱللَّهُ سَرِيعُ ٱلْحِسَابِ
Wal-lażīna kafarū a‘māluhum kasarābim biqī‘atiy yaḥsabuhuẓ-ẓam'ānu mā'ā(n), ḥattā iżā jā'ahū lam yajidhu syai'aw wa wajadallāha ‘indahū fa waffāhu ḥisābah(ū), wallāhu sarī‘ul-ḥisāb(i).
रहे वे लोग जिन्होंने इनकार किया उनके कर्म चटियल मैदान में मरीचिका की तरह है कि प्यासा उसे पानी समझता है, यहाँ तक कि जब वह उसके पास पहुँचा तो उसे कुछ भी न पाया। अलबत्ता अल्लाह ही को उसके पास पाया, जिसने उसका हिसाब पूरा-पूरा चुका दिया। और अल्लाह बहुत जल्द हिसाब करता है
📝 टिप्पणी
521) काफ़िरों (अविश्वास करने वालों) के कर्म चूंकि ईमान पर आधारित नहीं हैं, इसलिए उन्हें आख़िरत (परलोक) में अल्लाह सुब्हानहू व तआला के यहाँ कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा, यद्यपि दुनिया में वे यह सोचते रहे कि उन्हें उनके उन कर्मों का बदला मिलेगा।