सूरह फ़ुस्सिलत
وَإِذَآ أَنْعَمْنَا عَلَى ٱلْإِنسَـٰنِ أَعْرَضَ وَنَـَٔا بِجَانِبِهِۦ وَإِذَا مَسَّهُ ٱلشَّرُّ فَذُو دُعَآءٍ عَرِيضٍ
Wa iżā an‘amnā ‘alal-insāni a‘raḍa wa na'ā bijānibih(ī), wa iżā massahusy-syarru fażū du‘ā'in ‘arīḍ(in).
जब हम मनुष्य पर अनुकम्पा करते है तो वह ध्यान में नहीं लाता और अपना पहलू फेर लेता है। किन्तु जब उसे तकलीफ़ छू जाती है, तो वह लम्बी-चौड़ी प्रार्थनाएँ करने लगता है
सभी आयत 54 आयत