सूरह अल-बक़रा
أَيَّامًا مَّعْدُودَٰتٍ ۚ فَمَن كَانَ مِنكُم مَّرِيضًا أَوْ عَلَىٰ سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ أَيَّامٍ أُخَرَ ۚ وَعَلَى ٱلَّذِينَ يُطِيقُونَهُۥ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِينٍ ۖ فَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَهُوَ خَيْرٌ لَّهُۥ ۚ وَأَن تَصُومُوا۟ خَيْرٌ لَّكُمْ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
Ayyāmam ma‘dūdāt(in), faman kāna minkum marīḍan au ‘alā safarin fa ‘iddatum min ayyāmin ukhar(a), wa ‘alal-lażīna yuṭīqūnahū fidyatun ṭa‘āmu miskīn(in), faman taṭawwa‘a khairan fahuwa khairul lah(ū), wa an taṣūmū khairul lakum in kuntum ta‘lamūn(a).
गिनती के कुछ दिनों के लिए - इसपर भी तुममें कोई बीमार हो, या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में संख्या पूरी कर ले। और जिन (बीमार और मुसाफ़िरों) को इसकी (मुहताजों को खिलाने की) सामर्थ्य हो, उनके ज़िम्मे बदलें में एक मुहताज का खाना है। फिर जो अपनी ख़ुशी से कुछ और नेकी करे तो यह उसी के लिए अच्छा है और यह कि तुम रोज़ा रखो तो तुम्हारे लिए अधिक उत्तम है, यदि तुम जानो
📝 टिप्पणी
51) जो कोई एक दिन में एक से अधिक मिसकीन (ग़रीब) को खाना खिलाता है, तो यह उसके लिए अधिक बेहतर है।