सूरह अल-बक़रा
۞ إِنَّ ٱلصَّفَا وَٱلْمَرْوَةَ مِن شَعَآئِرِ ٱللَّهِ ۖ فَمَنْ حَجَّ ٱلْبَيْتَ أَوِ ٱعْتَمَرَ فَلَا جُنَاحَ عَلَيْهِ أَن يَطَّوَّفَ بِهِمَا ۚ وَمَن تَطَوَّعَ خَيْرًا فَإِنَّ ٱللَّهَ شَاكِرٌ عَلِيمٌ
Innaṣ-ṣafā wal-marwata min sya‘ā'irillāh(i), faman ḥajjal-baita awi‘tamara falā junāḥa ‘alaihi ay yaṭṭawwafa bihimā, wa man taṭawwa‘a khairan fa innallāha syākirun ‘alīm(un).
निस्संदेह सफ़ा और मरवा अल्लाह की विशेष निशानियों में से हैं; अतः जो इस घर (काबा) का हज या उमपा करे, उसके लिए इसमें कोई दोष नहीं कि वह इन दोनों (पहाडियों) के बीच फेरा लगाए। और जो कोई स्वेच्छा और रुचि से कोई भलाई का कार्य करे तो अल्लाह भी गुणग्राहक, सर्वज्ञ है
📝 टिप्पणी
43) 'शआर' (شعائر - प्रतीकों) से तात्पर्य अल्लाह सुभानहु व तआला के धर्म की महानता के प्रतीकों से है। 44) 'सई' (Sa'i) का अर्थ है हज या उमराह के दौरान सफा और मरवा के बीच सात बार चलना और हल्की दौड़ (जॉगिंग) लगाना। "कोई गुनाह नहीं" वाक्यांश का उद्देश्य कुछ सहाबा के मन में सई करने को लेकर झिझक या आपत्ति को दूर करना था, क्योंकि सफा और मरवा पहले मूर्तियों (बुत) के स्थान थे। 45) अल्लाह सुभानहु व तआला द्वारा अपने बंदों का 'शुक्रगुज़ार होना' (कद्र करना) का तात्पर्य उन्हें उनके कर्मों का प्रतिफल (सवाब) देना, उनकी गलतियों को क्षमा करना, उनकी नेमतों को बढ़ाना आदि है।