सूरह फ़ातिर
وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۚ وَإِن تَدْعُ مُثْقَلَةٌ إِلَىٰ حِمْلِهَا لَا يُحْمَلْ مِنْهُ شَىْءٌ وَلَوْ كَانَ ذَا قُرْبَىٰٓ ۗ إِنَّمَا تُنذِرُ ٱلَّذِينَ يَخْشَوْنَ رَبَّهُم بِٱلْغَيْبِ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ ۚ وَمَن تَزَكَّىٰ فَإِنَّمَا يَتَزَكَّىٰ لِنَفْسِهِۦ ۚ وَإِلَى ٱللَّهِ ٱلْمَصِيرُ
Wa lā taziru wāziratuw wizra ukhrā, wa in tad‘u muṡqalatun ilā ḥimlihā lā yuḥmal minhu syai'uw wa lau kāna żā qurbā, innamā tunżirul-lażīna yakhsyauna rabbahum bil-gaibi wa aqāmuṣ-ṣalāh(ta), wa man tazakkā fa innamā yatazakkā linafsih(ī), wa ilallāhil-maṣīr(u).
कोई बोझ उठानेवाला किसी दूसरे का बोझ न उठाएगा। और यदि कोई कोई से दबा हुआ व्यक्ति अपना बोझ उठाने के लिए पुकारे तो उसमें से कुछ भी न उठाया, यद्यपि वह निकट का सम्बन्धी ही क्यों न हो। तुम तो केवल सावधान कर रहे हो। जो परोक्ष में रहते हुए अपने रब से डरते हैं और नमाज़ के पाबन्द हो चुके है (उनकी आत्मा का विकास हो गया) । और जिसने स्वयं को विकसित किया वह अपने ही भले के लिए अपने आपको विकसित करेगा। और पलटकर जाना तो अल्लाह ही की ओर है
📝 टिप्पणी
632) इससे अभिप्राय उन लोगों से है जिन्हें आप सचेत (ख़बरदार) कर सकते हैं और वे उसे स्वीकार करने के लिए तैयार हों।