सूरह अल-अनफ़ाल
وَلَوْ عَلِمَ ٱللَّهُ فِيهِمْ خَيْرًا لَّأَسْمَعَهُمْ ۖ وَلَوْ أَسْمَعَهُمْ لَتَوَلَّوا۟ وَّهُم مُّعْرِضُونَ
Wa lau ‘alimallāhu fīhim khairal la'asma‘ahum, wa lau asma‘ahum latawallau wa hum mu‘riḍūn(a).
यदि अल्लाह जानता कि उनमें कुछ भी भलाई है, तो वह उन्हें अवश्य सुनने का सौभाग्य प्रदान करता। और यदि वह उन्हें सुना देता तो भी वे कतराते हुए मुँह फेर लेते
📝 टिप्पणी
309) इस आयत में की गई कल्पना (शर्त) का अर्थ यह नहीं है कि अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) जानते नहीं थे। बल्कि यह आयत उनके सर्वज्ञान (सर्वज्ञता) की पुष्टि करती है कि उन लोगों के भीतर कोई भलाई है ही नहीं।
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