सूरह यूनुस

إِنَّمَا مَثَلُ ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا كَمَآءٍ أَنزَلْنَـٰهُ مِنَ ٱلسَّمَآءِ فَٱخْتَلَطَ بِهِۦ نَبَاتُ ٱلْأَرْضِ مِمَّا يَأْكُلُ ٱلنَّاسُ وَٱلْأَنْعَـٰمُ حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذَتِ ٱلْأَرْضُ زُخْرُفَهَا وَٱزَّيَّنَتْ وَظَنَّ أَهْلُهَآ أَنَّهُمْ قَـٰدِرُونَ عَلَيْهَآ أَتَىٰهَآ أَمْرُنَا لَيْلًا أَوْ نَهَارًا فَجَعَلْنَـٰهَا حَصِيدًا كَأَن لَّمْ تَغْنَ بِٱلْأَمْسِ ۚ كَذَٰلِكَ نُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لِقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ

Innamā maṡalul-ḥayātid-dun-yā kamā'in anzalnāhu minas-samā'i fakhtalaṭa bihī nabātul-arḍi mimmā ya'kulun-nāsu wal-an‘ām(u), ḥattā iżā akhażatil-arḍu zukhrufahā wazzayyanat wa ẓanna ahluhā annahum qādirūna ‘alaihā, atāhā amrunā lailan au nahāran fa ja‘alnāhā ḥaṣīdan ka'allam tagna bil-ams(i), każālika nufaṣṣilul-āyāti liqaumiy yatafakkarūn(a).

सांसारिक जीवन की उपमा तो बस ऐसी है जैसे हमने आकाश से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगनेवाली चीज़े, जिनको मनुष्य और चौपाये सभी खाते है, घनी हो गई, यहाँ तक कि धरती ने अपना शृंगार कर लिया और सँवर गई और उसके मालिक समझने लगे कि उन्हें उसपर पूरा अधिकार प्राप्त है कि रात या दिन में हमारा आदेश आ पहुँचा। फिर हमने उसे कटी फ़सल की तरह कर दिया, मानो कल वहाँ कोई आबादी ही न थी। इसी तरह हम उन लोगों के लिए खोल-खोलकर निशानियाँ बयान करते है, जो सोच-विचार से काम लेना चाहें

📝 टिप्पणी
348) इसका अर्थ यह है कि पृथ्वी अपने पहाड़ों और घाटियों के साथ अत्यंत सुंदर दिखाई देती है जो अपनी वनस्पतियों और फसलों के कारण हरी-भरी हो चुकी हैं।

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