सूरह यूनुस
وَيَعْبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَـٰٓؤُلَآءِ شُفَعَـٰٓؤُنَا عِندَ ٱللَّهِ ۚ قُلْ أَتُنَبِّـُٔونَ ٱللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِى ٱلسَّمَـٰوَٰتِ وَلَا فِى ٱلْأَرْضِ ۚ سُبْحَـٰنَهُۥ وَتَعَـٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
Wa ya‘budūna min dūnillāhi mā lā yaḍurruhum wa lā yanfa‘uhum wa yaqūlūna hā'ulā'i syufa‘ā'unā ‘indallāh(i), qul atunabbi'ūnallāha bimā lā ya‘lamu fis-samāwāti wa lā fil-arḍ(i), subḥānahū wa ta‘ālā ‘ammā yusyrikūn(a).
वे लोग अल्लाह से हटकर उनको पूजते हैं, जो न उनका कुछ बिगाड़ सकें और न उनका कुछ भला कर सकें। और वे कहते है, "ये अल्लाह के यहाँ हमारे सिफ़ारिशी है।" कह दो, "क्या तुम अल्लाह को उसकी ख़बर देनेवाले? हो, जिसका अस्तित्व न उसे आकाशों में ज्ञात है न धरती में" महिमावान है वह और उसकी उच्चता के प्रतिकूल है वह शिर्क, जो वे कर रहे है
📝 टिप्पणी
345) यह कथन उन मूर्तिपूजकों पर एक कटाक्ष (व्यंग्य) है जो यह सोचते हैं कि वे मूर्तियाँ अल्लाह तआला के सामने उन्हें कोई सहायता या लाभ पहुँचा सकती हैं। 346) इस आयत का अर्थ यह कतई नहीं है कि अल्लाह तआला आकाशों और पृथ्वी की किसी भी चीज़ से अनभिज्ञ है, बल्कि यह अल्लाह तआला के अतिरिक्त किसी अन्य पूज्य के अस्तित्व की पूर्ण असंभवता को दर्शाता है।