सूरह अल-क़मर

تَجْرِى بِأَعْيُنِنَا جَزَآءً لِّمَن كَانَ كُفِرَ

Tajrī bi'a‘yuninā, jazā'al liman kāna kufir(a).

जो हमारी निगाहों के सामने चल रही थी - यह बदला था उस व्यक्ति के लिए जिसकी क़द्र नहीं की गई।

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