सूरह अर-रअद

ٱللَّهُ ٱلَّذِى رَفَعَ ٱلسَّمَـٰوَٰتِ بِغَيْرِ عَمَدٍ تَرَوْنَهَا ۖ ثُمَّ ٱسْتَوَىٰ عَلَى ٱلْعَرْشِ ۖ وَسَخَّرَ ٱلشَّمْسَ وَٱلْقَمَرَ ۖ كُلٌّ يَجْرِى لِأَجَلٍ مُّسَمًّى ۚ يُدَبِّرُ ٱلْأَمْرَ يُفَصِّلُ ٱلْـَٔايَـٰتِ لَعَلَّكُم بِلِقَآءِ رَبِّكُمْ تُوقِنُونَ

Allāhul-lażī rafa‘as-samāwāti bigairi ‘amadin taraunahā ṡummastawā ‘alal-‘arsyi wa sakhkharasy-syamsa wal-qamar(a), kulluy yajrī li'ajalim musammā(n), yudabbirul-amra yufaṣṣilul-āyāti la‘allakum biliqā'i rabbikum tūqinūn(a).

अल्लाह वह है जिसने आकाशों को बिना सहारे के ऊँचा बनाया जैसा कि तुम उन्हें देखते हो। फिर वह सिंहासन पर आसीन हुआ। उसने सूर्य और चन्द्रमा को काम पर लगाया। हरेक एक नियत समय तक के लिए चला जा रहा है। वह सारे काम का विधान कर रहा है; वह निशानियाँ खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि तुम्हें अपने रब से मिलने का विश्वास हो

📝 टिप्पणी
377) सूरह अल-अराफ़/7: 54 की पादटिप्पणी (फुटनोट) देखें।

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