सूरह अर-रअद

وَٱلَّذِينَ صَبَرُوا۟ ٱبْتِغَآءَ وَجْهِ رَبِّهِمْ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَأَنفَقُوا۟ مِمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً وَيَدْرَءُونَ بِٱلْحَسَنَةِ ٱلسَّيِّئَةَ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَهُمْ عُقْبَى ٱلدَّارِ

Wal-lażīna ṣabarubtigā'a wajhi rabbihim wa aqāmuṣ-ṣalāta wa anfaqū mimmā razaqnāhum sirraw wa ‘alāniyataw wa yadra'ūna bil-ḥasanatis-sayyi'ata ulā'ika lahum ‘uqbad-dār(i).

और जिन लोगों ने अपने रब की प्रसन्नता की चाह में धैर्य से काम लिया और नमाज़ क़ायम की और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से खुले और छिपे ख़र्च किया, और भलाई के द्वारा बुराई को दूर करते है। वही लोग है जिनके लिए आख़िरत के घर का अच्छा परिणाम है,

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