सूरह अर-रअद
وَيَقُولُ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لَسْتَ مُرْسَلًا ۚ قُلْ كَفَىٰ بِٱللَّهِ شَهِيدًۢا بَيْنِى وَبَيْنَكُمْ وَمَنْ عِندَهُۥ عِلْمُ ٱلْكِتَـٰبِ
Wa yaqūlul-lażīna kafarū lasta mursalā(n), qul kafā billāhi syahīdam bainī wa bainakum, wa man ‘indahū ‘ilmul-kitāb(i).
जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, वे कहते है, "तुम कोई रसूल नहीं हो।" कह दो, "मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह की और जिस किसी के पास किताब का ज्ञान है उसकी, गवाही काफ़ी है।"
📝 टिप्पणी
383) "जिसके पास किताब का ज्ञान है" से तात्पर्य अहले-किताब (यहूदी और ईसाई ग्रंथों) के उन विद्वानों (उलेमा) से है जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था।
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