सूरह अर-रअद

وَهُوَ ٱلَّذِى مَدَّ ٱلْأَرْضَ وَجَعَلَ فِيهَا رَوَٰسِىَ وَأَنْهَـٰرًا ۖ وَمِن كُلِّ ٱلثَّمَرَٰتِ جَعَلَ فِيهَا زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ ۖ يُغْشِى ٱلَّيْلَ ٱلنَّهَارَ ۚ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَـَٔايَـٰتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ

Wa huwal-lażī maddal-arḍa wa ja‘ala fīhā rawāsiya wa anhārā(n), wa min kulliṡ-ṡamarāti ja‘ala fīhā zaujainiṡnaini yugsyil-lailan-nahār(a), inna fī żālika la'āyātil liqaumiy yatafakkarūn(a).

और वही है जिसने धरती को फैलाया और उसमें जमे हुए पर्वत और नदियाँ बनाई और हरेक पैदावार की दो-दो क़िस्में बनाई। वही रात से दिन को छिपा देता है। निश्चय ही इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ है जो सोच-विचार से काम लेते है

📝 टिप्पणी
378) पृथ्वी के भूभाग की बनावट मैदानों और पहाड़ों के रूप में है, जिनके बीच नदियाँ बहती हैं। यह भूमि फल देने वाले पौधों के उगने का स्थान है, जिनमें परागण (पॉलिनेशन) की प्रक्रिया फूलों की युग्मित (जोड़े वाली) संरचना—नर और मादा—के कारण होती है। यह सब पृथ्वी के घूमने (घूर्णन) के कारण दिन और रात का अनुभव करते हैं।

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