सूरह अर-रअद
وَٱلَّذِينَ ءَاتَيْنَـٰهُمُ ٱلْكِتَـٰبَ يَفْرَحُونَ بِمَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ ۖ وَمِنَ ٱلْأَحْزَابِ مَن يُنكِرُ بَعْضَهُۥ ۚ قُلْ إِنَّمَآ أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ ٱللَّهَ وَلَآ أُشْرِكَ بِهِۦٓ ۚ إِلَيْهِ أَدْعُوا۟ وَإِلَيْهِ مَـَٔابِ
Wal-lażīna ātaināhumul-kitāba yafraḥūna bimā unzila ilaika wa minal-aḥzābi may yunkiru ba‘ḍah(ū), qul innamā umirtu an a‘budallāha wa lā usyrika bih(ī), ilaihi ad‘ū wa ilaihi ma'āb(i).
जिन लोगों को हमने किताब प्रदान की है वे उससे, जो तुम्हारी ओर उतारा है, हर्षित होते है और विभिन्न गिरोहों के कुछ लोग ऐसे भी है जो उसकी कुछ बातों का इनकार करते है। कह दो, "मुझे पर बस यह आदेश हुआ है कि मैं अल्लाह की बन्दगी करूँ और उसका सहभागी न ठहराऊँ। मैं उसी की ओर बुलाता हूँ और उसी की ओर मुझे लौटकर जाना है।"
📝 टिप्पणी
381) यहाँ "उन्हें" (या वे) से तात्पर्य उन यहूदियों और ईसाइयों से है जो अल्लाह तआला का इनकार नहीं करते और न ही उसके रसूलों (पैगंबरों) को झुठलाते हैं।