सूरह ता-हा

فَأَكَلَا مِنْهَا فَبَدَتْ لَهُمَا سَوْءَٰتُهُمَا وَطَفِقَا يَخْصِفَانِ عَلَيْهِمَا مِن وَرَقِ ٱلْجَنَّةِ ۚ وَعَصَىٰٓ ءَادَمُ رَبَّهُۥ فَغَوَىٰ

Fa akalā minhā fa badat lahumā sau'ātuhumā wa ṭafiqā yakhṣifāni ‘alaihimā miw waraqil-jannah(ti), wa ‘aṣā ādamu rabbahū fa gawā.

अन्ततः उन दोनों ने उसमें से खा लिया, जिसके परिणामस्वरूप उनकी छिपाने की चीज़े उनके आगे खुल गई और वे दोनों अपने ऊपर जन्नत के पत्ते जोड-जोड़कर रखने लगे। और आदम ने अपने रब की अवज्ञा की, तो वह मार्ग से भटक गया

📝 टिप्पणी
485) यहाँ अपने रब की नाफ़रमानी (आदेश का उल्लंघन) करने से तात्पर्य भूलवश या अनजाने में अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) की मनाही का उल्लंघन करने से है, जैसा कि इसी सूरह की आयत 115 में उल्लेख किया गया है। वहीं, 'ख़िलाफ़' (चूक) से अभिप्राय शैतान के बहकावे में आने से है। यद्यपि आम इंसानों के पैमाने के अनुसार हज़रत आदम (अलयहिस्सलाम) की यह भूल इतनी बड़ी नहीं थी, परंतु उनके उच्च मर्तबे और प्रतिष्ठा के कारण उनकी इस चूक को नाफ़रमानी का नाम दिया गया, ताकि यह बड़े पदों पर आसीन महापुरुषों और नेताओं के लिए भी एक आदर्श बने कि वे वर्जित कार्यों से दूर रहें, चाहे वे कितने ही छोटे क्यों न हों।

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