सूरह हूद

أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يَكُونُوا۟ مُعْجِزِينَ فِى ٱلْأَرْضِ وَمَا كَانَ لَهُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِنْ أَوْلِيَآءَ ۘ يُضَـٰعَفُ لَهُمُ ٱلْعَذَابُ ۚ مَا كَانُوا۟ يَسْتَطِيعُونَ ٱلسَّمْعَ وَمَا كَانُوا۟ يُبْصِرُونَ

Ulā'ika lam yakūnū mu‘jizīna fil-arḍi wa mā kāna lahum min dūnillāhi min auliyā'(a), yuḍā‘afu lahumul-‘ażāb(u), mā kānū yastaṭī‘ūnas-sam‘a wa mā kānū yubṣirūn(a).

वे धरती में क़ाबू से बाहर नहीं जा सकते और न अल्लाह से हटकर उनका कोई समर्थक ही है। उन्हें दोहरी यातना दी जाएगी। वे न सुन ही सकते थे और न देख ही सकते थे

📝 टिप्पणी
355) सूरह आले इमरान/3: 28 की पादटिप्पणी (फुटनोट) देखें।

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