सूरह हूद

قَالُوا۟ يَـٰشُعَيْبُ أَصَلَوٰتُكَ تَأْمُرُكَ أَن نَّتْرُكَ مَا يَعْبُدُ ءَابَآؤُنَآ أَوْ أَن نَّفْعَلَ فِىٓ أَمْوَٰلِنَا مَا نَشَـٰٓؤُا۟ ۖ إِنَّكَ لَأَنتَ ٱلْحَلِيمُ ٱلرَّشِيدُ

Qālū yā syu‘aibu aṣalātuka ta'muruka an natruka mā ya‘budu ābā'unā au an naf‘ala fī amwālinā mā nasyā'(u), innaka la'antal-ḥalīmur-rasyīd(u).

वे बोले, "ऐ शुऐब! क्या तेरी नमाज़ तुझे यही सिखाती है कि उन्हें हम छोड़ दें जिन्हें हमारे बाप-दादा पूजते आए है या यह कि हम अपने माल का उपभोग अपनी इच्छानुसार न करें? बस एक तू ही तो बड़ा सहनशील, समझदार रह गया है!"

📝 टिप्पणी
361) उन्होंने ये बातें पैगंबर शुऐब (अलैहिस्सलाम) का उपहास उड़ाने (मज़ाक बनाने) के लिए कही थीं।

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