सूरह अल-अनकबूत
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ فَإِذَآ أُوذِىَ فِى ٱللَّهِ جَعَلَ فِتْنَةَ ٱلنَّاسِ كَعَذَابِ ٱللَّهِ وَلَئِن جَآءَ نَصْرٌ مِّن رَّبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمْ ۚ أَوَلَيْسَ ٱللَّهُ بِأَعْلَمَ بِمَا فِى صُدُورِ ٱلْعَـٰلَمِينَ
Wa minan-nāsi may yaqūlu āmannā billāhi fa'iżā ūżiya fillāhi ja‘ala fitnatan-nāsi ka‘ażābillāh(i), wa la'in jā'a naṣrum mir rabbika layaqūlunna innā kunnā ma‘akum, awa laisallāhu bi'a‘lama bimā fī ṣudūril-‘ālamīn(a).
लोगों में ऐसे भी है जो कहते है कि "हम अल्लाह पर ईमान लाए," किन्तु जब अल्लाह के मामले में वे सताए गए तो उन्होंने लोगों की ओर से आई हुई आज़माइश को अल्लाह की यातना समझ लिया। अब यदि तेरे रब की ओर से सहायता पहुँच गई तो कहेंगे, "हम तो तुम्हारे साथ थे।" क्या जो कुछ दुनियावालों के सीनों में है उसे अल्लाह भली-भाँति नहीं जानता?
📝 टिप्पणी
570) वह व्यक्ति मनुष्यों के अत्याचार (ज़ुल्म) की भयावहता को अल्लाह सुब्हानहू व तआला के अज़ाब (दंड) की भयंकरकता के समान समझता है, जिसके कारण वह अपने ईमान (धर्म) को छोड़ देता है।