सूरह अल-अनकबूत
وَلَمَّآ أَن جَآءَتْ رُسُلُنَا لُوطًا سِىٓءَ بِهِمْ وَضَاقَ بِهِمْ ذَرْعًا وَقَالُوا۟ لَا تَخَفْ وَلَا تَحْزَنْ ۖ إِنَّا مُنَجُّوكَ وَأَهْلَكَ إِلَّا ٱمْرَأَتَكَ كَانَتْ مِنَ ٱلْغَـٰبِرِينَ
Wa lammā an jā'at rusulunā lūṭan sī'a bihim wa ḍāqa bihim żar‘aw wa qālū lā takhaf wa lā taḥzan, innā munajjūka wa ahlaka illamra'ataka kānat minal-gābirīn(a).
जब यह हुआ कि हमारे भेजे हुए लूत के पास आए तो उनका आना उसे नागवार हुआ और उनके प्रति दिल को तंग पाया। किन्तु उन्होंने कहा, "डरो मत और न शोकाकुल हो। हम तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को बचा लेंगे सिवाय तुम्हारी स्त्री के। वह पीछे रह जानेवालों में से है
📝 टिप्पणी
574) नबी लूत (अलैहिस्सलाम) अल्लाह सुब्हानहू व तआला के उन दूतों (फ़रिश्तों) के आने से दुखी व चिंतित हो गए क्योंकि वे अत्यंत सुंदर युवक थे, जबकि लूत की क़ौम समलैंगिकता के लिए सुंदर युवकों को बहुत पसंद करती थी। उन्होंने महसूस किया कि यदि उनकी क़ौम की ओर से कोई उपद्रव हुआ, तो वे उनकी रक्षा करने में असमर्थ होंगे।