सूरह अल-अनकबूत

يُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ وَيَرْحَمُ مَن يَشَآءُ ۖ وَإِلَيْهِ تُقْلَبُونَ

Yu‘ażżibu may yasyā'u wa yarḥamu may yasyā'(u), wa ilaihi tuqlabūn(a).

वह जिसे चाहे यातना दे और जिसपर चाहे दया करे। और उसी की ओर तुम्हें पलटकर जाना है।"

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