सूरह अल-फ़त्ह

إِنَّ ٱلَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ ٱللَّهَ يَدُ ٱللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ ۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَىٰ نَفْسِهِۦ ۖ وَمَنْ أَوْفَىٰ بِمَا عَـٰهَدَ عَلَيْهُ ٱللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا

Innal-lażīna yubāyi‘ūnaka innamā yubāyi‘ūnallāh(a), yadullāhi fauqa aidīhim, faman nakaṡa fa'innamā yankuṡu ‘alā nafsih(ī), wa man aufā bimā ‘āhada ‘alaihullāha fa sayu'tīhi ajran ‘aẓīmā(n).

(ऐ नबी) वे लोग जो तुमसे बैअत करते है वे तो वास्तव में अल्लाह ही से बैअत करते है। उनके हाथों के ऊपर अल्लाह का हाथ होता है। फिर जिस किसी ने वचन भंग किया तो वह वचन भंग करके उसका बवाल अपने ही सिर लेता है, किन्तु जिसने उस प्रतिज्ञा को पूरा किया जो उसने अल्लाह से की है तो उसे वह बड़ा बदला प्रदान करेगा

📝 टिप्पणी
692) यह आयत अल्लाह के गुणों (आयात-ए-सिफ़ात) से संबंधित है। इसके अर्थ को लेकर मुफ़स्सिरों (कुरआन के व्याख्याताओं) के अलग-अलग मत हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि "हाथ" से तात्पर्य अल्लाह की शक्ति और संप्रभुता (क़ुदरत) से है। वहीं, कुछ अन्य विद्वान इसे उस निष्ठा की शपथ (बैअत) पर अल्लाह की निगरानी और गवाही के रूप में देखते हैं जो कुछ लोगों ने पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दी थी।

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