सूरह सबा
وَلِسُلَيْمَـٰنَ ٱلرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌ ۖ وَأَسَلْنَا لَهُۥ عَيْنَ ٱلْقِطْرِ ۖ وَمِنَ ٱلْجِنِّ مَن يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِإِذْنِ رَبِّهِۦ ۖ وَمَن يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ أَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ ٱلسَّعِيرِ
Wa lisulaimānar-rīḥa guduwwuhā syahruw wa rawāḥuhā syahr(un), wa asalnā lahū ‘ainal-qiṭr(i), wa minal-jinni may ya‘malu baina yadaihi bi'iżni rabbih(ī), wa may yazig minhum ‘an amrinā nużiqhu min ‘ażābis-sa‘īr(i).
और सुलैमान के लिए वायु को वशीभुत कर दिया था। प्रातः समय उसका चलना एक महीने की राह तक और सायंकाल को उसका चलना एक महीने की राह तक - और हमने उसके लिए पिघले हुए ताँबे का स्रोत बहा दिया - और जिन्नों में से भी कुछ को (उसके वशीभूत कर दिया था,) जो अपने रब की अनुज्ञा से उसके आगे काम करते थे। (हमारा आदेशा था,) "उनमें से जो हमारे हुक्म से फिरेगा उसे हम भडकती आग का मज़ा चखाएँगे।"
📝 टिप्पणी
623) जब हज़रत सुलेमान (अलैहिस्सलाम) सुबह से दोपहर तक की यात्रा करते, तो उनके द्वारा तय की गई दूरी ऊँट की एक महीने की यात्रा के बराबर होती थी।