सूरह सबा
وَلَا تَنفَعُ ٱلشَّفَـٰعَةُ عِندَهُۥٓ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُۥ ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا۟ مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا۟ ٱلْحَقَّ ۖ وَهُوَ ٱلْعَلِىُّ ٱلْكَبِيرُ
Wa lā tanfa‘usy-syafā‘atu ‘indahū illā liman ażina lah(ū), ḥattā iżā fuzzi‘a ‘an qulūbihim qālū māżā, qāla rabbukum, qālul-ḥaqq(a), wa huwal-‘aliyyul-kabīr(u).
और उसके यहाँ कोई सिफ़ारिश काम नहीं आएगी, किन्तु उसी की जिसे उसने (सिफ़ारिश करने की) अनुमति दी हो। यहाँ तक कि जब उनके दिलों से घबराहट दूर हो जाएगी, तो वे कहेंगे, "तुम्हारे रब ने क्या कहा?" वे कहेंगे, "सर्वथा सत्य। और वह अत्यन्त उच्च, महान है।"
📝 टिप्पणी
627) सिफ़ारिश (शफ़ाअत) का होना केवल अल्लाह सुबहानहु व ताआला की अनुमति (इजाज़त) से ही संभव है। सिफ़ारिश करने की अनुमति पाने वाले और सिफ़ारिश प्राप्त करने वाले, दोनों ही अल्लाह की अनुमति की प्रतीक्षा में भय और व्याकुलता महसूस करते हैं।