सूरह अल-वाक़िआ

لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا تَأْثِيمًا

Lā yasma‘ūna fīhā lagwaw wa lā ta'ṡīmā(n).

उसमें वे न कोई व्यर्थ बात सुनेंगे और न गुनाह की बात;

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