सूरह मरयम

قُلْ مَن كَانَ فِى ٱلضَّلَـٰلَةِ فَلْيَمْدُدْ لَهُ ٱلرَّحْمَـٰنُ مَدًّا ۚ حَتَّىٰٓ إِذَا رَأَوْا۟ مَا يُوعَدُونَ إِمَّا ٱلْعَذَابَ وَإِمَّا ٱلسَّاعَةَ فَسَيَعْلَمُونَ مَنْ هُوَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضْعَفُ جُندًا

Qul man kāna fiḍ-ḍalālati falyamdud lahur-raḥmānu maddā(n), ḥattā iżā ra'au mā yū‘adūna immal-‘ażāba wa immas-sā‘ata fa saya‘lamūna man huwa syarrum makānaw wa aḍ‘afu jundā(n).

कह दो, "जो गुमराही में पड़ा हुआ है उसके प्रति तो यही चाहिए कि रहमान उसकी रस्सी ख़ूब ढीली छोड़ दे, यहाँ तक कि जब ऐसे लोग उस चीज़ को देख लेंगे जिसका उनसे वादा किया जाता है - चाहे यातना हो या क़ियामत की घड़ी - तो वे उस समय जान लेंगे कि अपने स्थान की स्पष्ट से कौन निकृष्ट और जत्थे की दृष्टि से अधिक कमजोर है।"

📝 टिप्पणी
464) इसका अर्थ उनकी आयु को लंबी करना और उन्हें सुख-सुविधाओं तथा ऐशो-आराम में जीने देना है।

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