सूरह अल-फुरक़ान
يَوْمَ يَرَوْنَ ٱلْمَلَـٰٓئِكَةَ لَا بُشْرَىٰ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُجْرِمِينَ وَيَقُولُونَ حِجْرًا مَّحْجُورًا
Yauma yaraunal-malā'ikata lā busyrā yauma'iżil lil-mujrimīna wa yaqūlūna ḥijram maḥjūrā(n).
जिस दिन वे फ़रिश्तों को देखेंगे उस दिन अपराधियों के लिए कोई ख़ुशख़बरी न होगी और वे पुकार उठेंगे, "पनाह! पनाह!!"
📝 टिप्पणी
528) यह एक ऐसा कथन है जो अरब लोग आमतौर पर किसी शत्रु का सामना करते समय या किसी अपरिहार्य (अनिवार्य) विपत्ति के समय बोलते थे। इस कथन का अर्थ है कि 'अल्लाह सुब्हानहू व तआला इस ख़तरे को मुझसे दूर रखे'।
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