सूरह या-सीन

وَلَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنَـٰهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا ٱسْتَطَـٰعُوا۟ مُضِيًّا وَلَا يَرْجِعُونَ

Wa lau nasyā'u lamasakhnāhum ‘alā makānatihim famastaṭā‘ū muḍiyyaw wa lā yarji‘ūn(a).

यदि हम चाहें तो उनकी जगह पर ही उनके रूप बिगाड़कर रख दें क्योंकि वे सत्य की ओर न चल सके और वे (गुमराही से) बाज़ नहीं आते।

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