सूरह अल-इसरा
سُبْحَـٰنَ ٱلَّذِىٓ أَسْرَىٰ بِعَبْدِهِۦ لَيْلًا مِّنَ ٱلْمَسْجِدِ ٱلْحَرَامِ إِلَى ٱلْمَسْجِدِ ٱلْأَقْصَا ٱلَّذِى بَـٰرَكْنَا حَوْلَهُۥ لِنُرِيَهُۥ مِنْ ءَايَـٰتِنَآ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلْبَصِيرُ
Subḥānal-lażī asrā bi‘abdihī lailam minal-masjidil ḥarāmi ilal-masjidil-aqṣal-lażī bāraknā ḥaulahū linuriyahū min āyātinā, innahū huwas-samī‘ul-baṣīr(u).
क्या ही महिमावान है वह जो रातों-रात अपने बन्दे (मुहम्मद) को प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से दूरवर्ती मस्जिद (अक़्सा) तक ले गया, जिसके चतुर्दिक को हमने बरकत दी, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निस्संदेह वही सब कुछ सुनता, देखता है
📝 टिप्पणी
425) मस्जिद-ए-अक़्सा और उसके आस-पास के क्षेत्र को अल्लाह सुब्हानहू व तआला ने बरकत दी है, जिसमें वहाँ कई नबियों का भेजा जाना और वहाँ की भूमि का उपजाऊ होना शामिल है.