सूरह अल-इसरा
وَلَا تَقْتُلُوا۟ ٱلنَّفْسَ ٱلَّتِى حَرَّمَ ٱللَّهُ إِلَّا بِٱلْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِۦ سُلْطَـٰنًا فَلَا يُسْرِف فِّى ٱلْقَتْلِ ۖ إِنَّهُۥ كَانَ مَنصُورًا
Wa lā taqtulun-nafsal-latī ḥarramallāhu illā bil-ḥaqq(i), wa man qutila maẓlūman faqad ja‘alnā liwaliyyihī sulṭānan falā yusrif fil-qatl(i), innahū kāna manṣūrā(n).
किसी जीव की हत्या न करो, जिसे (मारना) अल्लाह ने हराम ठहराया है। यह और बात है कि हक़ (न्याय) का तक़ाज़ा यही हो। और जिसकी अन्यायपूर्वक हत्या की गई हो, उसके उत्तराधिकारी को हमने अधिकार दिया है (कि वह हत्यारे से बदला ले सकता है), किन्तु वह हत्या के विषय में सीमा का उल्लंघन न करे। निश्चय ही उसकी सहायता की जाएगी
📝 टिप्पणी
427) सूरह अल-अनआम/6: 151 का फुटनोट (टिप्पणी) देखें। 428) यहाँ अधिकार (शक्ति) से तात्पर्य हत्या के शिकार व्यक्ति के वारिसों या वैध सरकार के उस अधिकार से है जिसके तहत वे क़िसास (बदले) की माँग कर सकते हैं या दियत (रक्तधन/मुआवज़ा) स्वीकार कर सकते हैं (देखें सूरह अल-बक़रह/2: 178 और अन-निसा/4: 92)।