सूरह अल-इसरा
أَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَ لِدُلُوكِ ٱلشَّمْسِ إِلَىٰ غَسَقِ ٱلَّيْلِ وَقُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْءَانَ ٱلْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا
Aqimiṣ-ṣalāta lidulūkisy-syamsi ilā gasaqil-laili wa qur'ānal-fajr(i), inna qur'ānal-fajri kāna masyhūdā(n).
नमाज़ क़ायम करो सूर्य के ढलने से लेकर रात के छा जाने तक और फ़ज्र (प्रभात) के क़ुरआन (अर्थात फ़ज्र की नमाज़ः के पाबन्द रहो। निश्चय ही फ़ज्र का क़ुरआन पढ़ना हुज़ूरी की चीज़ है
📝 टिप्पणी
436) यह आयत पाँचों समय की नमाज़ों के औक़ात (समय) को स्पष्ट करती है। सूरज का ढलना ज़ुहर और अस्र की नमाज़ के समय को दर्शाता है, जबकि रात का अंधेरा मग़रिब, इशा और फ़ज्र की नमाज़ के समय को दर्शाता है। 437) अहमद द्वारा रिवायत की गई हदीस में उल्लेख है कि फ़ज्र की नमाज़ में वे फ़रिश्ते गवाह बनते हैं जिनकी ड्यूटी रात और दिन में होती है।