सूरह आल-इमरान

۞ وَسَارِعُوٓا۟ إِلَىٰ مَغْفِرَةٍ مِّن رَّبِّكُمْ وَجَنَّةٍ عَرْضُهَا ٱلسَّمَـٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ أُعِدَّتْ لِلْمُتَّقِينَ

Wa sāri‘ū ilā magfiratim mir rabbikum wa jannatin ‘arḍuhas-samāwātu wal-arḍ(u), u‘iddat lil-muttaqīn(a).

और अपने रब की क्षमा और उस जन्नत की ओर बढ़ो, जिसका विस्तार आकाशों और धरती जैसा है। वह उन लोगों के लिए तैयार है जो डर रखते है

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