सूरह आल-इमरान
مَّا كَانَ ٱللَّهُ لِيَذَرَ ٱلْمُؤْمِنِينَ عَلَىٰ مَآ أَنتُمْ عَلَيْهِ حَتَّىٰ يَمِيزَ ٱلْخَبِيثَ مِنَ ٱلطَّيِّبِ ۗ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُطْلِعَكُمْ عَلَى ٱلْغَيْبِ وَلَـٰكِنَّ ٱللَّهَ يَجْتَبِى مِن رُّسُلِهِۦ مَن يَشَآءُ ۖ فَـَٔامِنُوا۟ بِٱللَّهِ وَرُسُلِهِۦ ۚ وَإِن تُؤْمِنُوا۟ وَتَتَّقُوا۟ فَلَكُمْ أَجْرٌ عَظِيمٌ
Mā kānallāhu liyażaral-mu'minīna ‘alā mā antum ‘alaihi ḥattā yamīzal-khabīṡa minaṭ-ṭayyib(i), wa mā kānallāhu liyuṭli‘akum ‘alal-gaibi wa lākinnallāha yajtabī mir rusulihī may yasyā'(u), fa āminū billāhi wa rusulih(ī), wa in tu'minū wa tattaqū fa lakum ajrun ‘aẓīm(un).
अल्लाह ईमानवालों को इस दशा में नहीं रहने देगा, जिसमें तुम हो। यह तो उस समय तक की बात है जबतक कि वह अपवित्र को पवित्र से पृथक नहीं कर देता। और अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। किन्तु अल्लाह इस काम के लिए जिसको चाहता है चुन लेता है, और वे उसके रसूल होते है। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ। और यदि तुम ईमान लाओगे और (अल्लाह का) डर रखोगे तो तुमको बड़ा प्रतिदान मिलेगा
📝 टिप्पणी
138) इससे तात्पर्य मुसलमानों और मुनाफ़िक़ों (कपटी लोगों) के आपस में मिले-जुले होने से है। 139) उहुद के युद्ध में, अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) ने अच्छे (सच्चे मुसलमानों) और बुरे (मुनाफ़िक़ों) के बीच अंतर स्पष्ट कर दिया। 140) परोक्ष (ग़ैब) की बातों में से एक बात किसी व्यक्ति के सच्चे ईमान या उसकी मुनाफ़क़त (कपटता) का ज्ञान होना है। 141) जिन लोगों को अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) ने किसी के दिल के कपट को जानने के लिए चुना, उनमें नबी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) शामिल हैं।