सूरह आल-इमरान

وَمَا كَانَ قَوْلَهُمْ إِلَّآ أَن قَالُوا۟ رَبَّنَا ٱغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِىٓ أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَٱنصُرْنَا عَلَى ٱلْقَوْمِ ٱلْكَـٰفِرِينَ

Wa mā kāna qauluhum illā an qālū rabbanagfir lanā żunūbanā wa isrāfanā fī amrinā wa ṡabbit aqdāmanā wanṣurnā ‘alal-qaumil-kāfirīn(a).

उन्होंने कुछ नहीं कहा सिवाय इसके कि "ऐ हमारे रब! तू हमारे गुनाहों को और हमारे अपने मामले में जो ज़्यादती हमसे हो गई हो, उसे क्षमा कर दे और हमारे क़दम जमाए रख, और इनकार करनेवाले लोगों के मुक़ाबले में हमारी सहायता कर।"

📝 टिप्पणी
123) अत्यधिक कार्यों (सीमा लांघने) से तात्पर्य अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) द्वारा निर्धारित कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करने से है।

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