सूरह आल-इमरान

وَكَأَيِّن مِّن نَّبِىٍّ قَـٰتَلَ مَعَهُۥ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ فَمَا وَهَنُوا۟ لِمَآ أَصَابَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ وَمَا ضَعُفُوا۟ وَمَا ٱسْتَكَانُوا۟ ۗ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلصَّـٰبِرِينَ

Wa ka'ayyim min nabiyyin qātal(a), ma‘ahū ribbiyyūna kaṡīr(un), famā wahanū limā aṣābahum fī sabīlillāhi wa mā ḍa‘ufū wa mastakānū, wallāhu yuḥibbuṣ-ṣābirīn(a).

कितने ही नबी ऐसे गुज़रे है जिनके साथ होकर बहुत-से ईशभक्तों ने युद्ध किया, तो अल्लाह के मार्ग में जो मुसीबत उन्हें पहुँची उससे वे न तो हताश हुए और न उन्होंने कमज़ोरी दिखाई और न ऐसा हुआ कि वे दबे हो। और अल्लाह दृढ़तापूर्वक जमे रहनेवालों से प्रेम करता है

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