सूरह आल-इमरान
قُلْ يَـٰٓأَهْلَ ٱلْكِتَـٰبِ لِمَ تَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِ مَنْ ءَامَنَ تَبْغُونَهَا عِوَجًا وَأَنتُمْ شُهَدَآءُ ۗ وَمَا ٱللَّهُ بِغَـٰفِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
Qul yā ahlal-kitābi lima taṣuddūna ‘an sabīlillāhi man āmana tabgūnahā ‘iwajaw wa antum syuhadā'(u), wa mallāhu bigāfilin ‘ammā ta‘malūn(a).
कहो, "ऐ किताबवालो! तुम ईमान लानेवालों को अल्लाह के मार्ग से क्यो रोकते हो, तुम्हें उसमें किसी टेढ़ की तलाश रहती है, जबकि तुम भली-भाँति वास्तविकता से अवगत हो और जो कुछ तुम कर रहे हो, अल्लाह उससे बेख़बर नहीं है।"
📝 टिप्पणी
110) "साक्षी होने" (गवाही देने) का अर्थ यह जानना है कि वह धर्म जिससे अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) प्रसन्न और संतुष्ट है, वह केवल इस्लाम है।