सूरह अल-माइदा

فَإِنْ عُثِرَ عَلَىٰٓ أَنَّهُمَا ٱسْتَحَقَّآ إِثْمًا فَـَٔاخَرَانِ يَقُومَانِ مَقَامَهُمَا مِنَ ٱلَّذِينَ ٱسْتَحَقَّ عَلَيْهِمُ ٱلْأَوْلَيَـٰنِ فَيُقْسِمَانِ بِٱللَّهِ لَشَهَـٰدَتُنَآ أَحَقُّ مِن شَهَـٰدَتِهِمَا وَمَا ٱعْتَدَيْنَآ إِنَّآ إِذًا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Fa in ‘uṡira ‘alā annahumastaḥaqqā iṡman fa ākharāni yaqūmāni maqāmahumā minal-lażīnastaḥaqqa ‘alaihimul-aulayāni fa yuqsimāni billāhi lasyahādatunā aḥaqqu min syahādatihimā wa ma‘tadainā, innā iżal laminaẓ-ẓālimīn(a).

फिर यदि पता चल जाए कि उन दोनों ने हक़ मारकर अपने को गुनाह में डाल लिया है, तो उनकी जगह दूसरे दो व्यक्ति उन लोगों में से खड़े हो जाएँ, जिनका हक़ पिछले दोनों ने मारना चाहा था, फिर वे दोनों अल्लाह की क़समें खाएँ कि "हम दोनों की गवाही उन दोनों की गवाही से अधिक सच्ची है और हमने कोई ज़्यादती नहीं की है। निस्सन्देह हमने ऐसा किया तो अत्याचारियों में से होंगे।"

📝 टिप्पणी
234) यहाँ पाप करने से तात्पर्य गवाही में झूठ या धोखाधड़ी करना है, जिसका पता उसके शपथ (क़सम) लेने के बाद चले।

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