सूरह अल-माइदा
قُلْ هَلْ أُنَبِّئُكُم بِشَرٍّ مِّن ذَٰلِكَ مَثُوبَةً عِندَ ٱللَّهِ ۚ مَن لَّعَنَهُ ٱللَّهُ وَغَضِبَ عَلَيْهِ وَجَعَلَ مِنْهُمُ ٱلْقِرَدَةَ وَٱلْخَنَازِيرَ وَعَبَدَ ٱلطَّـٰغُوتَ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضَلُّ عَن سَوَآءِ ٱلسَّبِيلِ
Qul hal unabbi'ukum bisyarrim min żālika maṡūbatan ‘indallāh(i), mal la‘anahullāhu wa gaḍiba ‘alaihi wa ja‘ala minhumul-qiradata wal-khanāzīra wa ‘abadaṭ-ṭāgūt(a), ulā'ika syarrum makānaw wa aḍallu ‘an sawā'is-sabīl(i).
कहो, "क्या मैं तुम्हें बताऊँ कि अल्लाह के यहाँ परिणाम की स्पष्ट से इससे भी बुरी नीति क्या है? कौन गिरोह है जिसपर अल्लाह की फिटकार पड़ी और जिसपर अल्लाह का प्रकोप हुआ और जिसमें से उसने बन्दर और सूअर बनाए और जिसने बढ़े हुए फ़सादी (ताग़ूत) की बन्दगी की, वे लोग (तुमसे भी) निकृष्ट दर्जे के थे। और वे (तुमसे भी अधिक) सीधे मार्ग से भटके हुए थे।"
📝 टिप्पणी
217) प्रतिफल (बदले) के रूप में इससे भी बदतर बात यह है कि अल्लाह (सुब्हानहू व तआला), पवित्र क़ुरआन और उससे पहले अवतरित पवित्र ग्रंथों पर ईमान लाने को गलत ठहराया जाए। 218) यह अभिशाप उन यहूदियों पर डाला गया था जिन्होंने सब्त (शनिवार) के दिन की पवित्रता का उल्लंघन किया था (देखें सूरह अल-बक़रह (2): 65)।