सूरह अल-माइदा

۞ يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوا۟ ٱلْيَهُودَ وَٱلنَّصَـٰرَىٰٓ أَوْلِيَآءَ ۘ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَآءُ بَعْضٍ ۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمْ فَإِنَّهُۥ مِنْهُمْ ۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهْدِى ٱلْقَوْمَ ٱلظَّـٰلِمِينَ

Yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tattakhiżul-yahūda wan-naṣārā auliyā'(a), ba‘ḍuhum auliyā'u ba‘ḍ(in), wa may yatawallahum minkum fa innahū minhum, innallāha lā yahdil-qaumaẓ-ẓālimīn(a).

ऐ ईमान लानेवालो! तुम यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाओ। वे (तुम्हारे विरुद्ध) परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। तुममें से जो कोई उनको अपना मित्र बनाएगा, वह उन्हीं लोगों में से होगा। निस्संदेह अल्लाह अत्याचारियों को मार्ग नहीं दिखाता

📝 टिप्पणी
215) सूरह आल-इमरान (3): 28 का फुटनोट (विशेष टिप्पणी) देखें।

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