सूरह अल-माइदा

وَلَوْ أَنَّهُمْ أَقَامُوا۟ ٱلتَّوْرَىٰةَ وَٱلْإِنجِيلَ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِم مِّن رَّبِّهِمْ لَأَكَلُوا۟ مِن فَوْقِهِمْ وَمِن تَحْتِ أَرْجُلِهِم ۚ مِّنْهُمْ أُمَّةٌ مُّقْتَصِدَةٌ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ سَآءَ مَا يَعْمَلُونَ

Wa lau annahum aqāmut-taurāta wal-injīla wa mā unzila ilaihim mir rabbihim la'akalū min fauqihim wa min taḥti arjulihim, minhum ummatum muqtaṣidah(tun), wa kaṡīrum minhum sā'a mā ya‘malūn(a).

और यदि वे तौरात और इनजील को और जो कुछ उनके रब की ओर से उनकी ओर उतारा गया है, उसे क़ायम रखते, तो उन्हें अपने ऊपर से भी खाने को मिलता और अपने पाँव के नीचे से भी। उनमें से एक गिरोह सीधे मार्ग पर चलनेवाला भी है, किन्तु उनमें से अधिकतर ऐसे है कि जो भी करते है बुरा होता है

📝 टिप्पणी
219) उनके पुरस्कार के रूप में, अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) उन पर अपनी कृपा बरसाएगा कि वर्षा करेगा और ऐसे पौधों को जीवन देगा जो प्रचुर मात्रा में फल देंगे।

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