सूरह अल-माइदा

وَلَوْ كَانُوا۟ يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلنَّبِىِّ وَمَآ أُنزِلَ إِلَيْهِ مَا ٱتَّخَذُوهُمْ أَوْلِيَآءَ وَلَـٰكِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُمْ فَـٰسِقُونَ

Wa lau kānū yu'minūna billāhi wan-nabiyyi wa mā unzila ilaihi mattakhażūhum auliyā'a wa lākinna kaṡīram minhum fāsiqūn(a).

और यदि वे अल्लाह और नबी पर और उस चीज़ पर ईमान लाते, जो उसकी ओर अवतरित हुईस तो वे उनको मित्र न बनाते। किन्तु उनमें अधिकतर अवज्ञाकारी है

📝 टिप्पणी
222) सूरह आल-इमरान (3): 28 का फुटनोट (विशेष टिप्पणी) देखें।

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