सूरह अल-माइदा

يَـٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ لَا تَتَّخِذُوا۟ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ دِينَكُمْ هُزُوًا وَلَعِبًا مِّنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ مِن قَبْلِكُمْ وَٱلْكُفَّارَ أَوْلِيَآءَ ۚ وَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ

Yā ayyuhal-lażīna āmanū lā tattakhiżul-lażīnattakhażū dīnakum huzuwaw wa la‘ibam minal-lażīna ūtul-kitāba min qablikum wal-kuffāra auliyā'(a), wattaqullāha in kuntum mu'minīn(a).

ऐ ईमान लानेवालो! तुमसे पहले जिनको किताब दी गई थी, जिन्होंने तुम्हारे धर्म को हँसी-खेल बना लिया है, उन्हें और इनकार करनेवालों को अपना मित्र न बनाओ। और अल्लाह का डर रखों यदि तुम ईमानवाले हो

📝 टिप्पणी
216) सूरह आल-इमरान (3): 28 का फुटनोट (विशेष टिप्पणी) देखें।

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