सूरह अल-माइदा
لَقَدْ أَخَذْنَا مِيثَـٰقَ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ وَأَرْسَلْنَآ إِلَيْهِمْ رُسُلًا ۖ كُلَّمَا جَآءَهُمْ رَسُولٌۢ بِمَا لَا تَهْوَىٰٓ أَنفُسُهُمْ فَرِيقًا كَذَّبُوا۟ وَفَرِيقًا يَقْتُلُونَ
Laqad akhażnā mīṡāqa banī isrā'īla wa arsalnā ilaihim rusulā(n), kullamā jā'ahum rasūlum bimā lā tahwā anfusuhum, farīqan każżabū wa farīqay yaqtulūn(a).
हमने इसराईल की सन्तान से दृढ़ वचन लिया और उनकी ओर रसूल भेजे। उनके पास जब भी कोई रसूल वह कुछ लेकर आया जो उन्हें पसन्द न था, तो कितनों को तो उन्होंने झुठलाया और कितनों की हत्या करने लगे
📝 टिप्पणी
221) यानी अल्लाह (सुब्हानहू व तआला) और उसके रसूलों पर ईमान लाने का वचन (प्रतिज्ञा)।