सूरह अत-तौबा

لَا يَزَالُ بُنْيَـٰنُهُمُ ٱلَّذِى بَنَوْا۟ رِيبَةً فِى قُلُوبِهِمْ إِلَّآ أَن تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمْ ۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ

Lā yazālu bun-yānuhumul-lażī banau rībatan fī qulūbihim illā an taqaṭṭa‘a qulūbuhum, wallāhu ‘alīmun ḥakīm(un).

उनका यह भवन जो उन्होंने बनाया है, सदैव उनके दिलों में खटक बनकर रहेगा। हाँ, यदि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ तो दूसरी बात है। अल्लाह तो सब कुछ जाननेवाला, अत्यन्त तत्वदर्शी है

📝 टिप्पणी
334) इसका अर्थ यह है कि जब तक उनकी मृत्यु न हो जाए या वे तौबा (पश्चाताप) करने के योग्य न रहें।

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