सूरह अत-तौबा
فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلْأَشْهُرُ ٱلْحُرُمُ فَٱقْتُلُوا۟ ٱلْمُشْرِكِينَ حَيْثُ وَجَدتُّمُوهُمْ وَخُذُوهُمْ وَٱحْصُرُوهُمْ وَٱقْعُدُوا۟ لَهُمْ كُلَّ مَرْصَدٍ ۚ فَإِن تَابُوا۟ وَأَقَامُوا۟ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُا۟ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّوا۟ سَبِيلَهُمْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
Fa iżansalakhal-asyhurul-ḥurumu faqtulul-musyrikīna ḥaiṡu wajattumūhum wa khużūhum waḥṣurūhum waq‘udū lahum kulla marṣad(in), fa in tābū wa aqāmuṣ-ṣalāta wa ātawuz-zakāta fa khallū sabīlahum, innallāha gafūrur raḥīm(un).
फिर, जब हराम (प्रतिष्ठित) महीने बीत जाएँ तो मुशरिकों को जहाँ कहीं पाओ क़त्ल करो, उन्हें पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा क्षमाशील, दयावान है
📝 टिप्पणी
320) यहाँ 'महीनों की पाबंदी' (निषिद्ध महीनों) से तात्पर्य उस चार महीने की अवधि से है जो उस समय मुशरिकों (मूर्तिपूजकों) को मोहलत के रूप में दी गई थी, यानी 10 ज़ुल-हिज्जा (इस आयत के नाज़िल होने का दिन) से लेकर 10 रबी-उल-आख़िर तक।