सूरह अत-तौबा

قَـٰتِلُوا۟ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلْيَوْمِ ٱلْـَٔاخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ ٱلْحَقِّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ حَتَّىٰ يُعْطُوا۟ ٱلْجِزْيَةَ عَن يَدٍ وَهُمْ صَـٰغِرُونَ

Qātilul-lażīna lā yu'minūna billāhi wa lā bil-yaumil-ākhiri wa lā yuḥarrimūna mā ḥarramallāhu wa rasūluhū wa lā yadīnūna dīnal-ḥaqqi minal-lażīna ūtul-kitāba ḥattā yu‘ṭul-jizyata ‘ay yadiw wa hum ṣāgirūn(a).

वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते है और न अन्तिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते है और न सत्यधर्म का अनुपालन करते है, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज़्या देने लगे

📝 टिप्पणी
323) जिज़्या (jizyah) उस सुरक्षा और सुविधाओं के बदले में दिया जाने वाला प्रतिफल या शुल्क है जो इस्लामी राज्य में रहने वाले यहूदी, ईसाई और अन्य धर्मों के अनुयायियों को प्राप्त होती हैं। 324) यह आयत और इसके जैसी अन्य आयतें धार्मिक युद्ध की स्थिति में लागू होती हैं, शांति की स्थिति में नहीं।

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