सूरह अत-तौबा

لَوْ كَانَ عَرَضًا قَرِيبًا وَسَفَرًا قَاصِدًا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَـٰكِنۢ بَعُدَتْ عَلَيْهِمُ ٱلشُّقَّةُ ۚ وَسَيَحْلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسْتَطَعْنَا لَخَرَجْنَا مَعَكُمْ يُهْلِكُونَ أَنفُسَهُمْ وَٱللَّهُ يَعْلَمُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ

Lau kāna ‘araḍan qarībaw wa safaran qāṣidal lattaba‘ūka wa lākim ba‘udat ‘alaihimusy-syuqqah(tu), wa sayaḥlifūna billāhi lawistaṭa‘nā lakharajnā ma‘akum, yuhlikūna anfusahum, wallāhu ya‘lamu innahum lakāżibūn(a).

यदि निकट (भविष्य में) ही कुछ मिलनेवाला होता और सफ़र भी हलका होता तो वे अवश्य तुम्हारे पीछे चल पड़ते, किन्तु मार्ग की दूरी उन्हें कठिन और बहुत दीर्घ प्रतीत हुई। अब वे अल्लाह की क़समें खाएँगे कि, "यदि हममें इसकी सामर्थ्य होती तो हम अवश्य तुम्हारे साथ निकलते।" वे अपने आपको तबाही में डाल रहे है और अल्लाह भली-भाँति जानता है कि निश्चय ही वे झूठे है

📝 टिप्पणी
327) इस आयत में अपने आप को हिलाक (नष्ट) करने से तात्पर्य यह है कि वे अपनी झूठी क़समों और झूठ के कारण बर्बाद हो जाएँगे।

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