सूरह अत-तौबा
وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُوا۟ مَسْجِدًا ضِرَارًا وَكُفْرًا وَتَفْرِيقًۢا بَيْنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ وَإِرْصَادًا لِّمَنْ حَارَبَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ مِن قَبْلُ ۚ وَلَيَحْلِفُنَّ إِنْ أَرَدْنَآ إِلَّا ٱلْحُسْنَىٰ ۖ وَٱللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَـٰذِبُونَ
Wal-lażīnattakhażū masjidan ḍirāraw wa kufraw wa tafrīqam bainal-mu'minīna wa irṣādal liman ḥāraballāha wa rasūlahū min qabl(u), wa layaḥlifunna in aradnā illal-ḥusnā, wallāhu yasyhadu innahum lakāżibūn(a).
और कुछ ऐसे लोग भी हैं , जिन्होंने मस्जिद बनाई इसलिए कि नुक़सान पहुँचाएँ और कुफ़्र करें और इसलिए कि ईमानवालों के बीच फूट डाले और उस व्यक्ति के घात लगाने का ठिकाना बनाएँ, जो इससे पहले अल्लाह और उसके रसूल से लड़ चुका है। वे निश्चय ही क़समें खाएँगे कि "हमने तो बस अच्छा ही चाहा था।" किन्तु अल्लाह गवाही देता है कि वे बिलकुल झूठे है
📝 टिप्पणी
333) "जिसने इससे पहले अल्लाह (सुब्हानहु व तआला) और उसके रसूल से युद्ध किया था" से तात्पर्य अबू आमिर नामक एक ईसाई भिक्षु (राहिब) से है, जिसके शियाम (सीरिया) से आने का वे इंतज़ार कर रहे थे ताकि वह उनके द्वारा बनाई गई मस्जिद में नमाज़ पढ़ाए, और अपने साथ रोमी सेना लेकर आए जो मुसलमानों से युद्ध करे। लेकिन, यह अबू आमिर आ नहीं सका क्योंकि शियाम में ही उसकी मृत्यु हो गई। मुनाफ़िकों (पाखंडियों) द्वारा बनाई गई उस मस्जिद को रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेश पर उस वह्य (प्रकाशना) के आधार पर गिरा दिया गया जो आपको तबूक के युद्ध से लौटने के बाद प्राप्त हुई थी।